साहब ने साश्चर्य एक बात लिखी थी और वही बात वे अन्यत्र भी करते थे कि ‘ऊपर-ऊपर कितनी ही भिन्नता क्यांे न हो, कितना भी विरोध क्यों न हो फिर भी ये सभी महाराष्ट्रीय अंतःकरण से एक हैं।’
यह बात स्मरण करते समय मुझे एक महान् देशभक्त की इसी तरह की एक उक्ति का स्मरण हो रहा है। वह बात जब मैं इंग्लैंड में था तब लाला हरदयाल ने कही थी, वे पुणे में तिलक से मिलने गए थे। उसके पश्चात् अपने प्रतिद्वंदी गोखले से भी मिलने गए। हिंदुस्थान
साहब ने साश्चर्य एक बात लिखी थी और वही बात वे अन्यत्र भी करते थे कि ‘ऊपर-ऊपर कितनी ही भिन्नता क्यांे न हो, कितना भी विरोध क्यों न हो फिर भी ये सभी महाराष्ट्रीय अंतःकरण से एक हैं।’
यह बात स्मरण करते समय मुझे एक महान् देशभक्त की इसी तरह की एक उक्ति का स्मरण हो रहा है। वह बात जब मैं इंग्लैंड में था तब लाला हरदयाल ने कही थी, वे पुणे में तिलक से मिलने गए थे। उसके पश्चात् अपने प्रतिद्वंदी गोखले से भी मिलने गए। हिंदुस्थान