घटना की असंभाव्यता की अपेक्षा उसकी अनुकूलता की ओर ही अधिक आकर्षित होती तथा उनके विश्वास को भी अपने साथ आकर्षित करती, अतः हर दो-तीन वर्षों के अंतराल से ‘उत्सव होनेवाला है’ जैसी गप उड़ा दी जाती। अब दुःख की अधिकता तथा निराशा से पागल बने बंदी उस गप के मिथ्या सिद्व होने तक उस पर विश्वास करते हुए कम-से-कम तब तक किंचित् सुख में कुछ दिन व्यतीत करते । यह क्रम निरंतर चलता रहता। आश्चर्य यह है कि ये समाचार बार-बार झुठलाए जाते, फिर
घटना की असंभाव्यता की अपेक्षा उसकी अनुकूलता की ओर ही अधिक आकर्षित होती तथा उनके विश्वास को भी अपने साथ आकर्षित करती, अतः हर दो-तीन वर्षों के अंतराल से ‘उत्सव होनेवाला है’ जैसी गप उड़ा दी जाती। अब दुःख की अधिकता तथा निराशा से पागल बने बंदी उस गप के मिथ्या सिद्व होने तक उस पर विश्वास करते हुए कम-से-कम तब तक किंचित् सुख में कुछ दिन व्यतीत करते । यह क्रम निरंतर चलता रहता। आश्चर्य यह है कि ये समाचार बार-बार झुठलाए जाते, फिर