उस संकट से मुक्त होने की कोई भी गप सर्वथा निरर्थक है, मुक्ति की इतनी सी भी आशा नहीं है। कोई अन्य व्यक्ति यही जताए कि यह गप और आशा भ्रम है, तो उस व्यक्ति पर ही अपनी निराशा का क्रोध उतारना तथा उसीपर संतुष्ट रहना मानव मन का स्वभाव ही है। हाईकोर्ट में एक आजन्म कारावास का दंड होने के पश्चात् जब हम पर दूसरा अभियोग चलाया गया तब हमारी मनोदेवी हमसे कहती- अब इस अभियोग में निन्यानवें प्रतिशत फांसी का दंड दिया जाएगा और हम मृत्यु
उस संकट से मुक्त होने की कोई भी गप सर्वथा निरर्थक है, मुक्ति की इतनी सी भी आशा नहीं है। कोई अन्य व्यक्ति यही जताए कि यह गप और आशा भ्रम है, तो उस व्यक्ति पर ही अपनी निराशा का क्रोध उतारना तथा उसीपर संतुष्ट रहना मानव मन का स्वभाव ही है। हाईकोर्ट में एक आजन्म कारावास का दंड होने के पश्चात् जब हम पर दूसरा अभियोग चलाया गया तब हमारी मनोदेवी हमसे कहती- अब इस अभियोग में निन्यानवें प्रतिशत फांसी का दंड दिया जाएगा और हम मृत्यु