विश्वास न होते हुए भी कोठरी में पुनः बंद होते समय अन्य जनों के उस संसर्गजन्य निराशा की बाधा ने मेरे मन को भी घेर लिया। उस दिन मेरा भविष्य उस कालकोठरी की चारदीवारी में चिन दिया गया। उसके बाहर सर्वत्र घोर निराशा। स्याह अंधेरा।
व्यक्तिगत मुक्ति का प्रश्न मिट गय। अब एक अन्य उत्सुकता ने मन को घेर लिया कि उत्सव के दिन स्वदेश को कुछ नए अधिकार मिले होंगे? क्रांति के जो चार-पांच वर्ष जीवन को दांव पर लगाए फटाफट बीत रहे थे, उनकी
विश्वास न होते हुए भी कोठरी में पुनः बंद होते समय अन्य जनों के उस संसर्गजन्य निराशा की बाधा ने मेरे मन को भी घेर लिया। उस दिन मेरा भविष्य उस कालकोठरी की चारदीवारी में चिन दिया गया। उसके बाहर सर्वत्र घोर निराशा। स्याह अंधेरा।
व्यक्तिगत मुक्ति का प्रश्न मिट गय। अब एक अन्य उत्सुकता ने मन को घेर लिया कि उत्सव के दिन स्वदेश को कुछ नए अधिकार मिले होंगे? क्रांति के जो चार-पांच वर्ष जीवन को दांव पर लगाए फटाफट बीत रहे थे, उनकी