के पश्चात् उन्हीं बंदियों की इस स्थिति में परिर्वतन आ जाता। ऐसे बंदी तो विरले ही होते जिनकी भूख दो-तीन वर्ष रहकर भी नहीं मरी। अतः कुल मिलाकर सरसरी तौर पर निश्चित की हुई भोजन की मात्रा अंदमान में ठीक तथा पर्याप्त ही होती। परंतु उस परिणाम के अनुसार अन्न प्राप्त होने के बाद उसके बंदियों के मुंह में जाने तक बीच में जो विघ्न आते, उनकी कोई सीमा ही नहीं थी। पंजाबी तथा पठानी मुसलमान प्रायः गेहूं भोजी होते हैं। वे चावल पसंद नहीं
के पश्चात् उन्हीं बंदियों की इस स्थिति में परिर्वतन आ जाता। ऐसे बंदी तो विरले ही होते जिनकी भूख दो-तीन वर्ष रहकर भी नहीं मरी। अतः कुल मिलाकर सरसरी तौर पर निश्चित की हुई भोजन की मात्रा अंदमान में ठीक तथा पर्याप्त ही होती। परंतु उस परिणाम के अनुसार अन्न प्राप्त होने के बाद उसके बंदियों के मुंह में जाने तक बीच में जो विघ्न आते, उनकी कोई सीमा ही नहीं थी। पंजाबी तथा पठानी मुसलमान प्रायः गेहूं भोजी होते हैं। वे चावल पसंद नहीं