मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

उससे बंदियों की थाली में प्रत्यक्ष जो भोजन परोसा जाता वह मात्रा में प्रायः कम ही होता।

रूचिकर भोजन

यदि मात्रा की बात छोड़ दें तो उस भोजन में न केवल स्वाद की कमी होती वरन् पौष्टिक तत्तवों की भी कमी थी। चाहे चावल कम मात्रा में दो, रोटी पेट भर भले ही न मिले, परंतु अधपका चावल मत दो, रोटी आधी सिंकी हुई, आधी जली हुई और कभी-कभी आटे के गीले गोले जैसी मत दो- इस तरह की प्रार्थनाएं हमें बार-बार करनी पड़ती। सात-आठ सौ लोगों का भोजन


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उससे बंदियों की थाली में प्रत्यक्ष जो भोजन परोसा जाता वह मात्रा में प्रायः कम ही होता।

रूचिकर भोजन

यदि मात्रा की बात छोड़ दें तो उस भोजन में न केवल स्वाद की कमी होती वरन् पौष्टिक तत्तवों की भी कमी थी। चाहे चावल कम मात्रा में दो, रोटी पेट भर भले ही न मिले, परंतु अधपका चावल मत दो, रोटी आधी सिंकी हुई, आधी जली हुई और कभी-कभी आटे के गीले गोले जैसी मत दो- इस तरह की प्रार्थनाएं हमें बार-बार करनी पड़ती। सात-आठ सौ लोगों का भोजन


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