उन साधारण बंदियों से, जो आजन्म कठोर परिश्रम तथा रूखे-सूखे भोजन से चिरपरिचित थे, अधिक घातक होता। स्वास्थ्यवर्धक भोजन विलासिता नहीं, जीने का साधन था। इन कष्टभोगी लोगों का, जिनमें रत्ती भर भी स्वार्थपराणयता का स्पर्श नहीं हुआ है और मार्ग का प्रश्न छोड़ने पर भी जो परार्थरत ही हैं, संघ का जीवित रहना निस्संदेह बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय लाभदायी था। इसी विश्वास तथा बुद्वि के बलबूते पर ही यह आंदोलन छेड़ा गया था। आश्चर्य की बात यह
उन साधारण बंदियों से, जो आजन्म कठोर परिश्रम तथा रूखे-सूखे भोजन से चिरपरिचित थे, अधिक घातक होता। स्वास्थ्यवर्धक भोजन विलासिता नहीं, जीने का साधन था। इन कष्टभोगी लोगों का, जिनमें रत्ती भर भी स्वार्थपराणयता का स्पर्श नहीं हुआ है और मार्ग का प्रश्न छोड़ने पर भी जो परार्थरत ही हैं, संघ का जीवित रहना निस्संदेह बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय लाभदायी था। इसी विश्वास तथा बुद्वि के बलबूते पर ही यह आंदोलन छेड़ा गया था। आश्चर्य की बात यह