चूं-चपड़ करने पर ऊपर से मार पड़ती और उस पर आज्ञाभंग का अभियोग को भंग करके राजबंदियों ने वर्षों तक इस बंदीवास में भी यह संघर्ष जारी रखा। पांच वर्षों के पश्चात् धीरे-धीरे परिवर्तन हुआ और बंदियों को मूसलधार वर्षा तथा कड़ी धूप में न बैठते हुए छांव में बैठने की अनुमति मिल गई। आधे पेट ही भोजन से उठाना बंद किया गया। आहर भी स्थिति में सुधार आ गया। भीतर भी बहुत सुधार आया और अंत में बारी की ‘ऐ बदमाशो, तुम काम के लिए आए हो, खाने के लिए नहीं,
चूं-चपड़ करने पर ऊपर से मार पड़ती और उस पर आज्ञाभंग का अभियोग को भंग करके राजबंदियों ने वर्षों तक इस बंदीवास में भी यह संघर्ष जारी रखा। पांच वर्षों के पश्चात् धीरे-धीरे परिवर्तन हुआ और बंदियों को मूसलधार वर्षा तथा कड़ी धूप में न बैठते हुए छांव में बैठने की अनुमति मिल गई। आधे पेट ही भोजन से उठाना बंद किया गया। आहर भी स्थिति में सुधार आ गया। भीतर भी बहुत सुधार आया और अंत में बारी की ‘ऐ बदमाशो, तुम काम के लिए आए हो, खाने के लिए नहीं,