के शब्दों में दे रहे हैं। श्री उपेद्रनाथ बनर्जी कहते हैं-
‘हमसे पहले सन् 1857 के राज्य क्रांतिकारियों में से जो क्रांतिकारी बंदी आजन्म कारावास का दंड लेकर कालेपानी आए थे, उनमें से प्रायः कोई भी जीवितावस्था में स्वदेश वापस नहीं लौटा- यह बात, उन असहनीय कष्टों को उठाते समय मेरे मन में बनी रहती। तब मन करता, एक रस्सा लेकर गले में फंदा डाल इस कर्म भोग से एकदम मुक्ति पर जाऊं। परंतु मुझसे यह साहस नहीं बन पड़ा। चुपचाप यथासंभव
के शब्दों में दे रहे हैं। श्री उपेद्रनाथ बनर्जी कहते हैं-
‘हमसे पहले सन् 1857 के राज्य क्रांतिकारियों में से जो क्रांतिकारी बंदी आजन्म कारावास का दंड लेकर कालेपानी आए थे, उनमें से प्रायः कोई भी जीवितावस्था में स्वदेश वापस नहीं लौटा- यह बात, उन असहनीय कष्टों को उठाते समय मेरे मन में बनी रहती। तब मन करता, एक रस्सा लेकर गले में फंदा डाल इस कर्म भोग से एकदम मुक्ति पर जाऊं। परंतु मुझसे यह साहस नहीं बन पड़ा। चुपचाप यथासंभव