एड़ी-चोटी एक करते हुए तेल का कोटा पूरा करने लिए कोल्हू चलाता रहा। एक दिन का स्मरण है-प्रातःकाल से संध्या तक कोल्हू चलाते-चलाते देह काष्ठवत् हो गई, हाथों में फोड़े उभरकर छाले पड़ गए, परंतु बीस पौंड तेल का कोटा पूरा नहीं हुआ। चक्कर आ रहा था, बीच-बीच में पेटी अफसर की अश्लील, भद्दी गालियांे की बौछार ह्नदय पर सपासप कोड़े बरसा रही थी। ऐसी अवस्था में संध्या समय मुझे बंदीपाल के सामने खड़ा किया गया। उसने बड़ी अभद्र भाषा में हमारा पितृश्राद्व करके- माता-पितरों का
एड़ी-चोटी एक करते हुए तेल का कोटा पूरा करने लिए कोल्हू चलाता रहा। एक दिन का स्मरण है-प्रातःकाल से संध्या तक कोल्हू चलाते-चलाते देह काष्ठवत् हो गई, हाथों में फोड़े उभरकर छाले पड़ गए, परंतु बीस पौंड तेल का कोटा पूरा नहीं हुआ। चक्कर आ रहा था, बीच-बीच में पेटी अफसर की अश्लील, भद्दी गालियांे की बौछार ह्नदय पर सपासप कोड़े बरसा रही थी। ऐसी अवस्था में संध्या समय मुझे बंदीपाल के सामने खड़ा किया गया। उसने बड़ी अभद्र भाषा में हमारा पितृश्राद्व करके- माता-पितरों का