मेरा आजीवन कारावास - Mera Aajivan Karavas

के लिए प्राणों का त्याग करना जिस तरह परम कर्तव्य है, उसी तरह मेरे भाई, मान-अपमान का त्याग करना भी पुनीत कर्तव्य ही है। अभी तक तुम मेरे


समान ही पच्चीस के अंदर-बाहर हो और मुझसे अधिक मुक्ति की आशा तुम्हें है। अतः धीरज रखो। अभी तो कष्ट झेलते हुए जी लो, जिससे भविष्य में मुक्ति मिलते ही पुनः भारत माता की सेवा कर सको।’’ इस तरह हड़बड़ी में चार शब्दों को संवाद हो गया। दो-चार दिन उसने निकाले। प्रतिदिन संध्या समय पसीने से लथपथ,


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के लिए प्राणों का त्याग करना जिस तरह परम कर्तव्य है, उसी तरह मेरे भाई, मान-अपमान का त्याग करना भी पुनीत कर्तव्य ही है। अभी तक तुम मेरे


समान ही पच्चीस के अंदर-बाहर हो और मुझसे अधिक मुक्ति की आशा तुम्हें है। अतः धीरज रखो। अभी तो कष्ट झेलते हुए जी लो, जिससे भविष्य में मुक्ति मिलते ही पुनः भारत माता की सेवा कर सको।’’ इस तरह हड़बड़ी में चार शब्दों को संवाद हो गया। दो-चार दिन उसने निकाले। प्रतिदिन संध्या समय पसीने से लथपथ,


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