निःशक्त तथा क्षीणधैर्य कैसे हुआ कि इस साधारण निमित्त से वह फिर जाए? एक ऐसे देशप्रेमी का दिमाग, जिसने भयंकर षड्यंत्र रचे, फांसी, कालापानी, विश्वासघात, बंदीशाला, बंदीवास आदि आघात हंसते-हंसते झेले और अनेक बार अपने सहयोगियों क साथ चल रहे स्वाभाविक विवादों के पचड़ों में भी कभी सिरफिरेपन अथवा चिड़चिड़ाहट को जरा भी व्यक्त नहीं किया। हम राजबंदियों में अकसर ही ऐसी चर्चाएं छिड़ती जो किसी भी देश के राजबंदियों में विपन्नावस्था मंे स्वाभाविक
निःशक्त तथा क्षीणधैर्य कैसे हुआ कि इस साधारण निमित्त से वह फिर जाए? एक ऐसे देशप्रेमी का दिमाग, जिसने भयंकर षड्यंत्र रचे, फांसी, कालापानी, विश्वासघात, बंदीशाला, बंदीवास आदि आघात हंसते-हंसते झेले और अनेक बार अपने सहयोगियों क साथ चल रहे स्वाभाविक विवादों के पचड़ों में भी कभी सिरफिरेपन अथवा चिड़चिड़ाहट को जरा भी व्यक्त नहीं किया। हम राजबंदियों में अकसर ही ऐसी चर्चाएं छिड़ती जो किसी भी देश के राजबंदियों में विपन्नावस्था मंे स्वाभाविक