चारा नहीं था। जी कड़ा करके एक दिन-दो-टूक जवाब दे दिया-जाओ, नहीं करता काम। जो जी में आए करो। .......अभियोग चलाया गया। मजिस्टेªट ने बहुतेरा समझाया। कहने लगे, कुछ दिन अस्पताल में विश्राम करो। परंतु आज तक भुगते हुए सभी कष्टों, यातनाओं के पश्चात् मुझे विश्वास हो गया था कि हम राजबंदी चाहे जितना कठोर परिश्रम करें उतना ही अधिक जोते जाएंगे। फिर मैं क्यों इतना कष्ट झेलूं? वे मेरे शरीर पर अधिकार जता सकते हैं; परंतु अपने मन पर, अपने मन पर,
चारा नहीं था। जी कड़ा करके एक दिन-दो-टूक जवाब दे दिया-जाओ, नहीं करता काम। जो जी में आए करो। .......अभियोग चलाया गया। मजिस्टेªट ने बहुतेरा समझाया। कहने लगे, कुछ दिन अस्पताल में विश्राम करो। परंतु आज तक भुगते हुए सभी कष्टों, यातनाओं के पश्चात् मुझे विश्वास हो गया था कि हम राजबंदी चाहे जितना कठोर परिश्रम करें उतना ही अधिक जोते जाएंगे। फिर मैं क्यों इतना कष्ट झेलूं? वे मेरे शरीर पर अधिकार जता सकते हैं; परंतु अपने मन पर, अपने मन पर,