असह्म दारूण यातनाएं भुगतते वह नानाविध पक्षियों का सही-सही स्वर निकालता हुआ उन्माद भरे ठहाके लगा रहा था। उस रात हमारी आंख नहीं लग रही थी।
यह निर्भीक, हंसमुख, हंसोड़ उल्लासकर जो फांसी का दंड सुनकर भी कहकहे लगा रहा था, वह उल्लासकर पागल हो जाय। इस तरह की यातनाएं अपना शरीर भी कहां तक सह सकता है-अपने ज्ञानतंतु भी कहां तक ऐसा ज्वर सह सकेंगे-इसी आशका से हर आजीवन कारावास प्राप्त राजबंदी विचलित होने लगा- उल्लासकर की एक-एक चीख
असह्म दारूण यातनाएं भुगतते वह नानाविध पक्षियों का सही-सही स्वर निकालता हुआ उन्माद भरे ठहाके लगा रहा था। उस रात हमारी आंख नहीं लग रही थी।
यह निर्भीक, हंसमुख, हंसोड़ उल्लासकर जो फांसी का दंड सुनकर भी कहकहे लगा रहा था, वह उल्लासकर पागल हो जाय। इस तरह की यातनाएं अपना शरीर भी कहां तक सह सकता है-अपने ज्ञानतंतु भी कहां तक ऐसा ज्वर सह सकेंगे-इसी आशका से हर आजीवन कारावास प्राप्त राजबंदी विचलित होने लगा- उल्लासकर की एक-एक चीख