कृत्य असंभवनीय प्रतीत हुआ। परंतु स्वयं कहने से कि यह सत्य है या मिथ्या- उल्लास बाबू की प्रकाशित पुस्तक से उसी की भाषा में सुनें-
‘इस अर्धमूच्र्छितावस्था में और यातनाओं से घिरे होने पर भी मुझे स्मरण है कि मेडिकल सुपरिंटेंडेंट ने विद्युत् पेटी लगवाकर विद्युत् दी। वह यातना मेरे लिए असहनीय थी। झटकों के ऊपर झटके खाते-खाते मेरे शरीर में विद्युत् संचार होने लगा। ऐसा प्रतीत होने लगा कि उसका प्रवाह मेरे शरीर के हर स्नायु,
कृत्य असंभवनीय प्रतीत हुआ। परंतु स्वयं कहने से कि यह सत्य है या मिथ्या- उल्लास बाबू की प्रकाशित पुस्तक से उसी की भाषा में सुनें-
‘इस अर्धमूच्र्छितावस्था में और यातनाओं से घिरे होने पर भी मुझे स्मरण है कि मेडिकल सुपरिंटेंडेंट ने विद्युत् पेटी लगवाकर विद्युत् दी। वह यातना मेरे लिए असहनीय थी। झटकों के ऊपर झटके खाते-खाते मेरे शरीर में विद्युत् संचार होने लगा। ऐसा प्रतीत होने लगा कि उसका प्रवाह मेरे शरीर के हर स्नायु,