कठोर व्यवहार करता था। कारागृह के बाहर कदम रखते ही वह अन्य साधारण मनुष्यों जैसा मनुष्य बन जाता। आगे चलकर उसके स्वभाव का उल्लेख किया जाएगा।
भीतर भी कष्ट और बाहर भी कष्ट। तथापि मैं यही कहता कि राजबंदी यथासंभव बाहर ही रहें, क्यांेकि बाहर प्रचार कार्य करना संभव होता था। इस प्रचार कार्यार्थ मैंने ठान लिया कि मैं स्वयं बाहर निकलने का ही प्रयास करूंगा, भले ही बाहर कितने ही कष्ट हों। अतः एक वर्ष पूरा होते ही मैंने बाहर भेजने
कठोर व्यवहार करता था। कारागृह के बाहर कदम रखते ही वह अन्य साधारण मनुष्यों जैसा मनुष्य बन जाता। आगे चलकर उसके स्वभाव का उल्लेख किया जाएगा।
भीतर भी कष्ट और बाहर भी कष्ट। तथापि मैं यही कहता कि राजबंदी यथासंभव बाहर ही रहें, क्यांेकि बाहर प्रचार कार्य करना संभव होता था। इस प्रचार कार्यार्थ मैंने ठान लिया कि मैं स्वयं बाहर निकलने का ही प्रयास करूंगा, भले ही बाहर कितने ही कष्ट हों। अतः एक वर्ष पूरा होते ही मैंने बाहर भेजने