महत्तवपूर्ण प्रश्न है सम्मान का। यह सिद्व होना चाहिए कि हम राजबंदी हैं, कोई चोर-उचक्के-डाकू नहीं। चीफ कमिश्नर ने उसे सूचित किया कि तुम्हारी मांग कभी स्वीकारी नहीं जा सकती। परंतु वह अपने ही हठ पर अड़ा रहा। आखिर कमिश्नर ने स्वयं आकर कहा, ‘‘तुम सोचते होगे के इस तरह तुम्हें यातनाओं में देखकर हमारा ह्नदय पसीजेगा या हम भयभीत होंगे, परंतु ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम इस तरह मर भी गए तो हमें इससे क्या?’’ परंतु चिंता न सही, पर अधिकारियों
महत्तवपूर्ण प्रश्न है सम्मान का। यह सिद्व होना चाहिए कि हम राजबंदी हैं, कोई चोर-उचक्के-डाकू नहीं। चीफ कमिश्नर ने उसे सूचित किया कि तुम्हारी मांग कभी स्वीकारी नहीं जा सकती। परंतु वह अपने ही हठ पर अड़ा रहा। आखिर कमिश्नर ने स्वयं आकर कहा, ‘‘तुम सोचते होगे के इस तरह तुम्हें यातनाओं में देखकर हमारा ह्नदय पसीजेगा या हम भयभीत होंगे, परंतु ऐसा कुछ नहीं होगा। तुम इस तरह मर भी गए तो हमें इससे क्या?’’ परंतु चिंता न सही, पर अधिकारियों