कुछ चुनिंदा राजबंदियों को उनके सामने उपस्थित किया गया। किसी की शिकायत का उत्तर मिला, ‘तुम लोगा सरकार के शत्रु हो, तुम्हें मृत्युदंड ही उचित था।’ किसी को बताया गया, ‘बात मत करो बाहर जाने की। तुम राजद्रोही षड्यंत्र रचते हो। प्रमाण हम सिद्व नहीं कर सकते। परंतु हम जानते हैं।’ मेरा संभाषण¹ आरंभ मंे तनिक कुटिल परंतु सौम्य स्वरूप का हो गया। सर साहब ने कहा, ‘‘सावरकर, आपने अपने पांवों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारी है। कितनी दुर्गत बनाई
कुछ चुनिंदा राजबंदियों को उनके सामने उपस्थित किया गया। किसी की शिकायत का उत्तर मिला, ‘तुम लोगा सरकार के शत्रु हो, तुम्हें मृत्युदंड ही उचित था।’ किसी को बताया गया, ‘बात मत करो बाहर जाने की। तुम राजद्रोही षड्यंत्र रचते हो। प्रमाण हम सिद्व नहीं कर सकते। परंतु हम जानते हैं।’ मेरा संभाषण¹ आरंभ मंे तनिक कुटिल परंतु सौम्य स्वरूप का हो गया। सर साहब ने कहा, ‘‘सावरकर, आपने अपने पांवों पर स्वयं कुल्हाड़ी मारी है। कितनी दुर्गत बनाई