ॅम ंतम ंसस इवतद तिममण्’ चैंकते हुए सब ऊपर देखने लगे। नानी गोपाल ने अचानक खड़े होकर सार्वजनिक व्याख्यान शुरू किया। ‘बोलना नहीं’ जैसे बारी के नियम का संपूर्ण प्रतिशोध लेने के लिए ही उसने भाषण आरंभ किया, ‘‘बंधुओं! हम सब जन्म से ही स्वतंत्र हैं। पे्रमपूर्वक एक-दूसरे से बात करना मनुष्य का प्रकृति सिद्व अधिकार है, और इसे भी यदि शत्रु छिनना चाहता है तो भला उसकी कौन सुनेगा? देखो, यह मैं बोल रहा हूं और बोलता ही रहूंगा।’’ इस तरह
ॅम ंतम ंसस इवतद तिममण्’ चैंकते हुए सब ऊपर देखने लगे। नानी गोपाल ने अचानक खड़े होकर सार्वजनिक व्याख्यान शुरू किया। ‘बोलना नहीं’ जैसे बारी के नियम का संपूर्ण प्रतिशोध लेने के लिए ही उसने भाषण आरंभ किया, ‘‘बंधुओं! हम सब जन्म से ही स्वतंत्र हैं। पे्रमपूर्वक एक-दूसरे से बात करना मनुष्य का प्रकृति सिद्व अधिकार है, और इसे भी यदि शत्रु छिनना चाहता है तो भला उसकी कौन सुनेगा? देखो, यह मैं बोल रहा हूं और बोलता ही रहूंगा।’’ इस तरह