यह उपस्थित हुआ कि उन्हें पस्तकें किस तरह मिलेंगी। प्रायः उन सभी घरों में अज्ञान का बसेरा था। यदि वे कुछ मांग करते तो घर से महंगे जूतों के पार्सल तो आ जाते, परंतु दुवन्नी-चवन्नी की पुस्तक मांगने पर भी नहीं आती। यह प्रार्थना व्यर्थ थी कि उन्हें सरकार की ओर से पुस्तकें मिलें। यही क्या कम उपकार था कि एकाध पुस्तक रखने की अनुमति मिल गई थी। अतः हम अपने निजी पार्सलों में क्रमिक तथा सुलभ इतिहास, भूगोलादि की पुस्तकें मंगवाने लगे।
यह उपस्थित हुआ कि उन्हें पस्तकें किस तरह मिलेंगी। प्रायः उन सभी घरों में अज्ञान का बसेरा था। यदि वे कुछ मांग करते तो घर से महंगे जूतों के पार्सल तो आ जाते, परंतु दुवन्नी-चवन्नी की पुस्तक मांगने पर भी नहीं आती। यह प्रार्थना व्यर्थ थी कि उन्हें सरकार की ओर से पुस्तकें मिलें। यही क्या कम उपकार था कि एकाध पुस्तक रखने की अनुमति मिल गई थी। अतः हम अपने निजी पार्सलों में क्रमिक तथा सुलभ इतिहास, भूगोलादि की पुस्तकें मंगवाने लगे।