कुछ दिन ऐसे ही काम चला। परंतु पक्की व्यवस्था के लिए शीध्र ही एक केंद्रीय संस्था स्ािापित की गई। पीछे
उल्लेख किया ही गया है, जिन राजबंदियों को राजनीति का ध्येस अथवा मार्ग का विवेक तथा रहस्य का आकलन नहीं हुआ था और जो किसी भी देशसेवक संस्था में शपथबद्व नहीं हुए थे- इस तरह के लोगों को शपथपूर्वक स्वदेशसेवा की दीक्षा तथा उस विवेक एंव रहस्य में का ज्ञानपूर्वक बोध कराने का उपक्रम प्रारंभ किया गया था। आगे-आगे उसी संस्था में राजबंदियों के संपर्क से,
कुछ दिन ऐसे ही काम चला। परंतु पक्की व्यवस्था के लिए शीध्र ही एक केंद्रीय संस्था स्ािापित की गई। पीछे
उल्लेख किया ही गया है, जिन राजबंदियों को राजनीति का ध्येस अथवा मार्ग का विवेक तथा रहस्य का आकलन नहीं हुआ था और जो किसी भी देशसेवक संस्था में शपथबद्व नहीं हुए थे- इस तरह के लोगों को शपथपूर्वक स्वदेशसेवा की दीक्षा तथा उस विवेक एंव रहस्य में का ज्ञानपूर्वक बोध कराने का उपक्रम प्रारंभ किया गया था। आगे-आगे उसी संस्था में राजबंदियों के संपर्क से,