तीस-चालीस रूपए प्रति माह कमा लेते। उसके पश्चात् चार-पांच महीनों में बाहर छोड़े गए राजबंदियों के कारण बाहर के बंदी अधिकारियों में ही नहीं, अपितु साधारण व्यापारी आदि ‘स्वतंत्र’ वर्ग में भी कई लोग देशभक्ति मंे रूचि लेना सीख चुके थे। उसी तरह बंदियों ने भी भीतर ली हुई शपथ का प्रचार करते रहकर लोगों में कम-अधिक मात्रा में राजनीति में रूचि तथा इस भाव का निर्माण किया था कि स्वदेशार्थ अपना भी कुछ कर्तव्य बनता है। उस उपनिवेश में डाॅक्टर,
तीस-चालीस रूपए प्रति माह कमा लेते। उसके पश्चात् चार-पांच महीनों में बाहर छोड़े गए राजबंदियों के कारण बाहर के बंदी अधिकारियों में ही नहीं, अपितु साधारण व्यापारी आदि ‘स्वतंत्र’ वर्ग में भी कई लोग देशभक्ति मंे रूचि लेना सीख चुके थे। उसी तरह बंदियों ने भी भीतर ली हुई शपथ का प्रचार करते रहकर लोगों में कम-अधिक मात्रा में राजनीति में रूचि तथा इस भाव का निर्माण किया था कि स्वदेशार्थ अपना भी कुछ कर्तव्य बनता है। उस उपनिवेश में डाॅक्टर,