इस महत्तवकांक्षा से प्रेरित होकर कि ‘मैं मुंशी बनूंगा’ कई बंदी पढ़ने लगते। कुछ ही ऐसे निकलते जो केवल इस उदात्त भावना से कि वह हमारी विद्या है, अथवा हम धर्मग्रंथ पढ़ सकेंगे, अथवा यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है, प्रोढ़वस्था में अ-आ से श्रीगणेश करते।
परंतु इसका बखान क्यों करे कि यह काम कितने झंझट का था। अ, आ, क, ख, पढ़ने के लिए देते अथवा ‘घर, कर’ आदि शब्द इन निपट अनाड़ी बंदियों को चोरी-छिपे पढ़ाना, और उलटे उनकी चिरौरी भी करना।
इस महत्तवकांक्षा से प्रेरित होकर कि ‘मैं मुंशी बनूंगा’ कई बंदी पढ़ने लगते। कुछ ही ऐसे निकलते जो केवल इस उदात्त भावना से कि वह हमारी विद्या है, अथवा हम धर्मग्रंथ पढ़ सकेंगे, अथवा यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है, प्रोढ़वस्था में अ-आ से श्रीगणेश करते।
परंतु इसका बखान क्यों करे कि यह काम कितने झंझट का था। अ, आ, क, ख, पढ़ने के लिए देते अथवा ‘घर, कर’ आदि शब्द इन निपट अनाड़ी बंदियों को चोरी-छिपे पढ़ाना, और उलटे उनकी चिरौरी भी करना।