प्राथमिक स्कूल खोलने के प्रस्ताव लाते हैं। वह शिक्षा देने के लिए किसी-न-किसी को आगे आना ही होगा न? प्राथमिक स्कूलों में इस तरह पढ़ाने में जीवन देने का व्रत किसी-न-किसी को लेना ही होगा न? फिर वह कष्टप्रद कार्य हम ही क्यों न करें? हम अध्यापकों के मोटे-तगड़े वेतन तथा सम्मानीय कुरसियों पर कब्जा करें और गावों में बारहखड़ियां रटाते हुए पढ़ाने का कष्टप्रद कार्य अन्य लोग संभालें, यह इच्छा कया अन्ययमूलक नहीं है? पतितोद्वार का कार्य राष्ट्रीय हित के लिए आवश्यक है। महान् मनीषी,
प्राथमिक स्कूल खोलने के प्रस्ताव लाते हैं। वह शिक्षा देने के लिए किसी-न-किसी को आगे आना ही होगा न? प्राथमिक स्कूलों में इस तरह पढ़ाने में जीवन देने का व्रत किसी-न-किसी को लेना ही होगा न? फिर वह कष्टप्रद कार्य हम ही क्यों न करें? हम अध्यापकों के मोटे-तगड़े वेतन तथा सम्मानीय कुरसियों पर कब्जा करें और गावों में बारहखड़ियां रटाते हुए पढ़ाने का कष्टप्रद कार्य अन्य लोग संभालें, यह इच्छा कया अन्ययमूलक नहीं है? पतितोद्वार का कार्य राष्ट्रीय हित के लिए आवश्यक है। महान् मनीषी,